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कुछ जमीन पर कुछ हवा में

श्रीलाल शुक्ल

प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन प्रकाशित वर्ष : 2002
पृष्ठ :236
मुखपृष्ठ : सजिल्द
पुस्तक क्रमांक : 2426
आईएसबीएन :9788126705498

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राग दरबारी और बिश्रामपुर का सन्त आदि चर्चित उपन्यासों के लेखक द्वारा लिखे गये व्यंग्यात्मक निबन्ध। खास उसी शैली में।

Kuchh Jamin Mein Kuchh Hava Mein

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

हिन्दी व्यंग्य विधा को जिन रचनाकारों ने सार्थकता सौंपी है,श्रीलाल शुक्ल उनकी पहली पंक्ति में गण्य हैं। हिन्दी जगत में उन्हें यह सम्मान ‘राग दरबारी’ और ‘पहल पड़ाव’ जैसे विशिष्ट उपन्यासों के कारण तो प्राप्त है ही,अपने व्यंग्यात्मक निबंधों के लिए भी है। यहाँ से वहाँ,अंगद का पाँव और उमराव नगर में कुछ दिन उनकी पूर्व प्रकाशित व्यंग्य-कृतियाँ हैं और इस क्रम में यह उनकी चौथी महत्वपूर्ण कृति है।

इन निबंधों में श्रीलाल शुक्ल की रचना-दृष्टि विभिन्न वस्तु-सत्यों को उकेरती दिखाई देती है। इनमें से पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित निबंधों के लिए ‘जमीन पर’ और रेडियो तथा दूरदर्शन से प्रसारित निबंधों के लिए ‘हवा में’ कहकर भी उन्होंने जिस व्यंग्यार्थ की व्यंजना की है, उसकी जद में सर्वप्रथम वे स्वयं भी आ खड़े हुए हैं। इसमें उनके व्यंग्य की ईमानदारी भी है और अंदाज भी। सामाजिक विसंगतियाँ,विडंबनाओं और समकालीन जीवन की विकृतियों, की बेलान, शल्य चिकित्सा में उनका गहरा विश्वास है। साहित्य कला, संस्कृति,धर्म,इतिहास और राजनीति-किसी की भी रुग्णता उनके सोद्देश्य व्यंग्योपचार का विषय हो सकती है। इसके अतिरिक्त यह संग्रह कुछ वरिष्ठ रचनाकारों को उनकी समग्र सृजनशीलता के संदर्भ में समझने का भी अवसर जुटाता है।

कहना न होगा कि श्रीलाल शुक्ल की यह व्यंग्य कृति हिन्दी व्यंग्य को कुछ और समृद्ध करने में सहायक होगी।

 

प्रस्तावना

‘कुछ जमीन पर, कुछ हवा में’ तीन प्रकार की रचनाएँ हैं: पत्र-पत्रिकाओं में छपा हुआ मेरा स्तंभ-लेखन जिसमें मैं कभी ज्यादा सक्रिय नहीं रहा, और कुछ पुरानी रचनाएँ-बहुत पुरानी-जो विभिन्न पत्रिकाओं में कभी छपी थीं। उनमें से यहाँ वही संगृहीत हैं जो आज भी प्रासंगिक हो सकती हैं या जिन्हें आप आज भी पुरातात्विक कौतूहल से पढ़ सकते हैं। यह तो हुआ वह ‘कुछ’ जो जमीन पर है।

बाकी रचनाएँ रेडियो-वार्ताएँ हैं। 1957 से लगभग तीस दशकों तक मैं समय-समय पर लखनऊ-इलाहाबाद रेडियो से वार्ताएँ प्रसारित करता रहा हूँ। इनमें अगर कोई विशेषता है तो यही कि घने साहित्यिक और समाजशास्त्रीय विषयों को मैंने सामान्य श्रोता के लिए-वाचिक परंपरा में-सहज ढंग से प्रस्तुत करने की कोशिश की है। इस श्रेणी की सामग्री मेरे पास काफी वजनी मिकदार में है पर यहाँ उसे छाँटकर संग्रह की आकार-विषयक संग्रहणीयता का आदर करते हुए, सीमित रूप में पेश किया गया है। आकाशवाणी पर प्रसारित होने के कारण ये वार्ताएँ अभी तक ‘हवा में’ रही हैं; अब दोनों जगह रहेंगी।
बी.-2251, इंदिरा नगर
लखनऊ-226 016
10 मार्च 1990

 

श्रीलाल शुक्ल

 

होरी और उन्नीस सौ चौरासी

 

 

1984 का दिसंबर। 1934-35 के दिन होते तो प्रेमचंद के उपन्यास ‘गोदान’ का नायक होरी इस वक्त अपने गाँव सेमरी में टूटे छप्पर के नीचे बैठा हुआ इधर-उधर से बीनकर लाई हुई लकड़ी और ईख की सूखी पत्तियों का अलाव ताप रहा होता। पर 1984-खासतौर से जार्ज आर्वेल के 1984-में होरी कुछ और ही हो गया है। वह अब हुक्का नहीं, बीड़ी पी रहा है। कछार में चोरी से चुआया हुआ महुए का ठर्रा भी वाजिब खुराक में पी चुका है। वह पंडित मातादीन की पक्की चौपाल में, पूस की रात के इस पहले पहर में टी.वी. देख रहा है और ‘प्रोलफीड’ खा रहा है।

‘पंडित’ मातादीन ? ‘गोदान’ के पाठक शायद चौंके। यह वही मातादीन है न जिसके पिता पंडित दातादीन थे, जिसने सिलिया नाम की चमारिन से प्यार किया था, जिसके प्यार का फल रामू था, जिसने बाद में सिलिया को अपनाते हुए कहा था, ‘‘मैं ब्राह्मण नहीं चमार ही रहना चाहता हूँ !’’ वह फिर से पंडित कैसे ? इसकी चर्चा बाद में होगी, पहले होरी और उसका ‘प्रोलफीड’।

‘प्रोलफीड’-बकौल जार्ज आर्वेल-प्रोलेतेरियत की खुराक, पार्टी की ओर से जनता को बराबर मिलनेवाला कूडा, मनोरंजन और फर्जी खबरों का मसाला। दूरदर्शन ‘प्रोलफीड’ उगल रहा है:

पिछले पाँच वर्षों में भारत की औसत सालाना विकास-दर 4.9% रही है, जबकि अमरीका की 1.2% और इंग्लैड की सिर्फ 0.3% । 1979-80 में कोयले का उत्पादन 10 करोड़ 40 लाख टन था। आज 1983-84 में यह बढ़कर 13 करोड़ 80 लाख  टन हो गया है। पेट्रोल का उत्पादन उसी दौरान 1 करोड़ 20 लाख से बढ़कर 2 करोड़ 60 लाख टन हो गया।...
होरी सुन रहा है, पर उसके लिए यह ऐसा संगीत है जिसके स्वरों का उतार-चढ़ाव तो समझ में आता है, शब्द पकड़ में नहीं आते। उसे कोयला और पेट्रोल से क्या लेना-देना ?

...जहाँ 1950-51 में सिर्फ 5 करोड़ टन अनाज पैदा हुआ था, अब 1984 में 15 करोड़ टन पैदा हुआ है..।
हुआ होगा, कहीं गोदामों में सड़ रहा होगा, चूहे खा रहे होंगे। उसे तो यह अनाज ‘काम के बदले अनाज’ के एवज में दाना-दाना गिनकर ही मिल रहा है, चार दिन भी बुखार आ जाए तो घर में चूल्हा नहीं जलेगा।
....राष्ट्रीयकृत बैकों की 24000 शाखाओं के जरिए 1983-84 में देहाती क्षेत्रों में 4500 करोड़ रुपये की रकम खेतिहर ऋण के रूप में बाँटी गई...।

जिसमें से दो-तिहाई ग्रामसेवकों, विकास-अधिकारियों, शाखा-प्रबंधकों की जेब में गई, जिससे उन्होंने ट्रक खरीदे और शहरों में कोठियाँ बनवाई, बाकी ऋण होरी जैसे अभागों को ऋणी बनाने के काम आया।

प्रोलफीड के शुरुआती आकड़े होरी के खयालों की बहती धारा में पतझर के पत्तों जैसे टपककर बह रहे थे। पर ऋण के ये आँकड़े उसकी चेतना पर दहकते हुए कोयलों-जैसे गिरे।

होरी के समुदाय ने रुपए और सूदखोरी की मार पीढ़ी-दर-पीढ़ी झेली है। ‘गोदान’ के दिनोंवाली वह साहूकारी। पंडित दातादीन, दुलारी सहुआइन झिंगुरींसिंह, पटेश्वरी मंगरू साह। पचास रुपए के कर्ज पर मंगरू साह ने तीन सौ रुपए निकाले थे, ईख नीलाम करवाई थी। मीठी जबान के बावजूद दुलारी सहुआइन नाक रगड़ाकर ही दो सौ रुपए देने को तैयार हुई थीं, आने पर ब्याज लेनेवाले पंडित दातादीन ने नौ साल में तीस रुपए पर दो सौ माँगे थे। उन्हीं की कृपा थी कि होरी की खेती-बारी टूट गई, ईख नहीं बो सका और किसान से मजदूर की श्रेणी में आ गया। तब एक-एक रुपए के पीछे जैसी घुटन, जैसा अपमान झेलना पड़ता था, उसकी याद आते ही आज भी दिल को एक झटका लगता है।

और, आज बकौल ‘प्रोलफीड’ 1983-84 में राष्ट्रीयकृत बैकों से 4500 करोड़ रुपए की रकम खेतिहर ऋण के रूप में बाँटी गई। होरी सार्वजनिक और स्वगत ढंग से कहता है: मार डाला बेईमानों ने।

1935 के होरी को साहूकारी सभ्यता के पेंच समझ में नहीं आए थे, सिर्फ इतना मालूम था-‘हम जाल में फँसे हैं। जितना ही फड़फड़ाओगे, उतना ही और जकड़ते जाओगे।’ एक तो सबकुछ भाग्य के अधीन था, दूसरे साहूकार भी तरह-तरह के थे। ‘‘ठाकुर या बनिए के रुपए होते तो ज्यादा चिंता न होती, पर ब्राह्मण के रुपए ! उसकी एक पाई भी दब गई तो हड्डी तोड़कर निकलेगी ! भगवान् न करे ब्राह्मण का कोप किसी पर गिरे !’’ तभी, जब गोबर ने दातादीन की सूदखोरी को चुनौती देकर तीस रुपए के कर्ज पर दो सौ की माँग के खिलाफ ब्याज समेत छाछठ रुपए लौटाने चाहे तो होरी ने साहूकार पंडित के चरण पकड़ लिए थे, कहा था, ‘‘महाराज, लड़कों की बातों पर मत जाओ। जब तक मैं जीता हूँ, तुम्हारी एक-एक पाई चुकाऊँगा।’’ उस साहूकारी तंत्र में बड़े रहस्य थे: सूद का कभी न समझ में आनेवाला हिसाब, बामन के कर्ज का डर, थाना-कचहरी की दौड़, खड़ी फसल की नीलामी, वसूली के तरीकों में गालियों और डंडे का प्रयोग, और सबसे बड़ी बात कि जितना ही फ़ड़फड़ाओगे उतना ही जकड़ते जाओगे।

1984 में बहुत कुछ बदला है पर सूदखोरी नहीं बदली। होरी के सिर पर अब दो तरह के कर्जें है। एक खेतिहर ऋण जो सिंचाई के साधन से लेकर खेती के औजारों, मशीनों, खाद, बीज आदि तक के लिए मिलता है, और दूसरा असली ऋण-बिरादरी में बेइज्जती से बचने के लिए लिया जानेवाला ऋण। पहले ऋण को सरकारी अर्थशास्त्री विकासपरक ऋण कहते हैं, दूसरे को सामाजिक दायित्वों वाला ऋण। चूँकि होरी को अर्थशास्त्र की नहीं, पुराणपंथियों की ही भाषा समझ में आती है, इसलिए पहले को देवऋण कहा जा सकता है, जो देवताओं की योनि में उपजे वित्त मंत्रालय के अधिकारियों, बड़े-बड़े बैंकरों, अर्थशास्त्रियों, ऋण-वितरण-सामारोहों की अध्यक्षता करनेवाले खादीपोश बहुरूपियों और चपरकनाती अफसरों की कृपा से प्राप्त होता है। दूसरा ऋण, उसी पुराणपंथी भाषा में पितृ-ऋण है जो पिता की कृपा से किसी जाति-विशेष में उत्पन्न होने के कारण मुंडन, छेदन, ब्याह, गौना, दसवाँ, तेरहीं आदि रस्मों को निपटाने के लिए फिर उन्हीं दुलारी सहुआइनों, उन्हीं दातादीनों, उन्हीं मंगरू साहुओं से लेना पड़ता है जो अब पहले से भी ज्यादा चतुर हैं, जिनके लड़के अब आई. ए. एस. में घुसकर या बिजनेस मैनेजमेंट की डिग्री लेकर उसी तबके में घुस रहे हैं जो देव-ऋण बाँटनेवालों का है। ‘उन्नीस सौ चौरासी’ का लेखक जार्ज आर्वेल इसे अपनी ‘न्यूस्पोक’ में ‘देपिसह’ कह सकता था-देव-पितृ-सहायता। ऋण अब रहा ही नहीं, जो भी ऋण देता है वह वास्तव में सहायता दे रहा है। और चूँकि देव-ऋण और पितृ-ऋण देनेवाले-दोनों ही किस्म के लोग एक ही वर्ग और एक ही पार्टी के हैं, इसलिए होरी को इन ऋणों से अलग-अलग तंत्र में भले ही फर्क मालूम पड़े, ऋण देनेवाले जानते हैं कि वे एक ही बिरादरी के हैं। इस तरह, दो कामों के लिए दो तरह का ऋण दो अलग-अलग रास्तों से आने के बावजूद चाहे सहकारी या सरकारी बैंक हो या पुश्तैनी सूदखोर, वसूली के मामले में दोनों एक-से घातक हैं, दोनों ही खेत कुर्क करा सकते हैं, दोनों ही हवालात भिजवा सकते हैं। यह सूदखोरी व्यवस्था का द्वित्व (डाइकॉटमी) नहीं है, सार्वजनिक और सहकारी क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र के दुर्दांत सूदखोरों का शांतिपूर्ण सहअस्तित्व है। संक्षेप में 1935 में होरी को जहाँ नदी के इस किनारे पर पड़े मगरमच्छ निगलने को झपटते थे, वहीं अब उसे दोनों किनारों पर अलग-अलग शक्लवाले, पर एक ही नस्ल के मगरमच्छों का सामना करना पड़ता है। होरी की यह अजीब नियति है कि वह इस नदी को छोड़कर कहीं भाग नहीं सकता।

प्रोलफीड में 4500 करोड़ रुपए के खेतिहर ऋण का हवाला होरी के गले में हड्डी की तरह अटक जाता है। इस खेतिहर ऋण ने उसके साथ जो किया है, वैसा पंडित दातादीन और सेमरी के सारे साहूकार मिलकर भी नहीं कर सकते थे। उनके सामने कम से कम घिघियाया जा सकता था, कोई दुलारी सहुआइन कुछ देर के लिए द्रवित भी हो सकती थी, पर इसके सामने कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कानूनबद्ध चेहरारहित साहूकार कभी उसके सामने आता ही नहीं है, उसके अस्तित्व का पता कुछ सरकारी कारकुनों और अखबार में छपनेवाली कुर्की के इश्तहारों से ही चलता है।

इस साहूकारी व्यवस्था के शिखर पर बैठे हुए जो परम उत्साही व्यवसाय-विशेषज्ञ शहरी बाबू हैं, जो इस देश की राजनीतिक संध्या के निर्जन सुनसान में अचानक भारत-भाग्य-विधाता बन गए हैं, वोट पकड़ने के तंत्र में कर्ज की राजनीति को खूब समझते हैं। पर वे यह नहीं समझते कि गरीबी सबसे पहले इन्सान की पहल करने की शक्ति को नष्ट करती है। सर्वहारा का मकरुज होना, वह अच्छी नस्ल की भैंस के कारण हो या बिरादरी के भोज के लिए, कोढ़ में सिर्फ खाज का काम करता है।

झिंगुरीसिंह के लिए अपनी उम्दा जोत के लिए, जो चकबंदी के कारकुनों के कारण और भी उम्दा हो गई है, ट्यूबवेल के लिए कर्ज लेना दीगर बात है। वह समृद्ध को समृद्धतर बनाता है। वह कर्ज वापस न कर सकें, तब भी अपनी समृद्धि और राजनीतिक पुर्जेबाजी के सहारे वह अपनी जोत बचा ले जाएगा। पर ठर्रे में गनगनाते दिमाग के साथ प्रोलफीड खाते हुए इस होरी के साथ 1984 में क्या हुआ।

कुछ साल पहले उसे, जैसे सुअर के बच्चे को चार आदमी दबाकर उसका गला रेतते हैं, एक नसबंदी शिविर में जाकर नसबंदी करानी पड़ी थी। उसकी एक नस काट दी गई, पर उसे ज्यादा दुख नहीं हुआ था। जबसे वह पैदा हुआ, एक-एक करके उसकी नसें ही काटी जा रही थीं। उसने इससे भी समझौता कर लिया। पर कुछ ही साल बाद नसबंदी-शिविरों की जगह खेतिहर-ऋण के शिविरों ने ले ली। अब विकास-खंड के कर्मचारी और तहसील का पूरा अमला गाँव पर गिद्धों की तरह उतर रहा था। सेमरी के पास के गाँव बिलारी में, जहाँ पहले वहाँ के जमींदार रायसाहब ‘गोदान’ के 1934 में रामलीला का जलसा कराते थे, उनके लड़के ने, जो विधायक भी थे और जिन्हें विधायक से मंत्री बनना था, साल भर पहले ऋण-वितरण शिविर लगवाया था, जिसका लक्ष्य खेतिहरों में बीस लाख रुपए का ऋण बाँटना था। दिल्ली का खादीपोश युवा नेता जो देश की अखंडता और एकता की लगातार बातें करता था और जिसकी बातें होरी की पहुँच से बाहर थी, पूरे चेहरे को मुस्कान का अगियाबेताल बनाकर लोगों को ऋण बांट रहा था। बैंक के हाकिम बरसाती मेंढ़कों की तरह उसके आसपास फुदक रहे ते। उसी जलसे में होरी पर भी कुछ हजार रुपयों का कर्ज लाद दिया गया था।

उसे भैंस की जरूरत नहीं थी। 1935 के होरी ने एक गाय खरीदी थी; उधार पर, वह किस्सा अभी तक लोगों को याद है। सबकुछ ठीक था पर उसके भाई ने डाह के मारे गाय को जहर दे दिया था। उसी झमेले में गाय का पुराना मालिक भोला उसके बैल खोल ले गया था। अब, 1984 में, होरी में कर्ज लेकर भैंस खरीदने की दम न थी। पर तहसीलवाले नहीं माने। कोई लंबा-चौड़ा हिसाब दिखाकर उन्होंने बताया कि भैंस के दूध से, बैंक का कर्ज चुकाते हुए भी, होरी को कई सौ रुपए महीने का मुनाफा होगा। पर यह होरी भाग्य के बारे में अब और भी चौकन्ना हो गया था। वह जानता था कि ऐसी खूबसूरत स्कीम को भीतर-ही-भीतर खाने के लिए कोई न कोई कीड़ा जरूर लगा होगा। वह कीड़ा ग्रामसेवक था जिसने कर्ज का एक हिस्सा कमीशन में कटवा लिया था, दूसरा पशु-चिकित्सक था जिसने एक बड़े मेले में अच्छी नस्ल की भैंसों की सामूहिक खरीद कराके उसे तीन थन वाली एक भैंस का पगहा पकड़ा दिया था।

भैंस बीमार हालत में आज भी होरी के दरवाजे पर है। 1935 में उसकी गाय को उसके भाई ने जहर दिया था। आज, 1984 में उसकी जिंदगी में इन ऋण-वितरण शिविरवालों ने इस भैंस के बहाने न जाने कितना जहर घोल दिया है, वसूली के लिए कुर्की आने ही वाली है।

यह देव-ऋण का हाल है। पितृ-ऋण के लिए यानी, सोना की शादी के लिए उसे रुपयों की जरूरत है; अब दहेज ठीक से न दिया जाए तो लड़की पर मिट्टी का तेल छिड़ककर उसे जला देते हैं। होरी को दहेज के लिए कर्ज चाहिए। पर इस काम के लिए राष्ट्रीयकृत बैंक, सहकारी बैंक, ग्रामीण बैंक-सब बेकार हैं। उधर आज गाँव में दु्लारी सहुआइन और मंगरू साह भी नहीं है। डकैतों के डर से वे शहर के एक घने मुहल्ले में-जो साहूकारों की पुश्तैनी बस्ती है-जा बसे हैं। इन साहूकारों के भव्य भवन बने हैं, वे टेलीफोन पर कारोबार करते हैं। खेतिहर-ऋण-वितरण-शिविरवाला खादीपोश नेता इनके यहाँ दावत खाने आता है। होरी की लड़की की शादी के लिए बैंक ऋण नहीं देगा, यह ऋण उसे इन्हीं सूदखोरों से मिलेगा और इनकी शर्तें मंगरू साह की शर्तों से भी ज्यादा भयावह है।

पंडित मातादीन को यह टी.वी. सेट, बहुत किफायती लागत पर, पार्टी के प्रचार के लिए मिला है। होरी और वैसे ही दस-पाँच होरियों को ‘प्रोलफीड’  के साथ छोड़कर वे मकान के अंदर चले गए हैं-उसी काम के लिए चोरी से चुराया हुआ महुए का ठर्रा पीने को। बाहर आकर यह देखकर कि टी.वी. पर कोई ऐसी गजल आ रही है, जिसमें गले लग जाने और बोसा लेने की इफारत है, वे सेट बंद कर देते हैं,। फिर लोगों को धर्मचारी जी का उपदेश, उनकी तांत्रिक सिद्धियों की महत्ता और उनके रचे भजनों का पाठ सुनाने लगते हैं।

पर वे तो चमार हो गए थे, फिर से पंडित कैसे हो गए ? ऐसे। सिलिया और उनका बेटा रामू पढ़ने में अच्छा निकला। उसने अपनी माँ की जाति को अपनी जाति बनाकर सुरक्षित जगहों में से आबकारी के इंस्पेक्टर की एक जगह ले ली। लड़के के इंस्पेक्टर बनते ही गाँववालों ने तय किया कि अब मातादीन को चमार नहीं कहा जा सकता, इसलिए उन्हें पंडितजी कहा जाने लगा। उनकी चुटिया अचानक बढ़ी ही नहीं, उठ भी गई, उनके शरीर पर तीन धागे फिर से वापस आ गए। जिस एक गाँव ने बेटे को चमार बनाकर इंस्पेक्टर बनाया, उसी ने बाप को फिर से ब्राह्मण बना दिया। अब मातादीन के यहाँ सरकारी अमलों की आमद-रफ्त बढ़ रही है। पार्टी की स्थानीय शाखा के वे अध्यक्ष नामजद हुए हैं।


ऐल्डास हक्सले के ‘ब्रेव न्यू वर्ल्ड’ में यौनाचार एक अच्छा और अनिवार्य कर्त्तव्य है, जार्ज आर्वेल के ‘उन्नीस सौ चौरासी’ में यौनाचार एक घटिया, गर्हित काम है। आज होरी के 1984 में सिर्फ बलात्कार से प्राप्त यौन-संतोष ही चरम संतोष है। ‘गोदान’ के 1935 में सोना, रूपा, सिलिया, झुनिया गाँव में मुक्त पक्षियों की तरह रहती थीं। खुद जिनके लिए उनके मन में आकर्षण हो, उन्हें छोड़कर बाकी सबसे भाईचारे के संबंध थे। शहर में पढ़नेवाले झिंगुरीसिंह के लड़कों ने ही उन दिनों भविष्य का इशारा दिया था, जब उनके बारे में कहा गया था कि शहर में पढ़ने जाकर उन्होंने गाँव की बिरादरी का नेम-धरम भुला दिया है।

अब होरी को सिर्फ सरकारी कर्ज की ही चिंता नहीं है, घर में जवान लड़कियों का बोझ उसे दिन-रात कुचलता रहता है। वह जमाना नहीं रहा जब गाँव के किसी लड़के की बदचलनी पर पंचायत बैठती थी, हर्जाना भरना पड़ता था। अब वह लड़का पंचायत को गाली देकर शहर भाग सकता है, वहाँ रिक्शा चलाकर किसी भी खेतिहर मजदूर से ज्यादा कमा सकता है।

चारों ओर असुरक्षा है। शाम से ही घरों के दरवाजे बंद हो जाते हैं। सूरज डूबते ही सन्नाटा छा जाता है। कभी-कभी कुत्ते भौंकते हैं, जिससे अँधेरे का आतंक और गहराने लगता है। चारों ओर के जंगल और बाग-सरकारी वनमहोत्सवों के ढकोसलों के बावजूद कट गए हैं। अब गीदड़ और चमगादड़ तक नहीं बोलते। ‘पूस की रात’ जैसी कहानी में जाड़ा ही अब सबसे बड़ा यथार्थ बचा है। हिरनों और नीलगायों के झुंड अब फसल चरने नहीं आते। उनकी जगह गिरोहबंद डकैतों ने ले ली है। वे किसी भी गाँव से निकल सकते है। वे सिर्फ लूटपाट करने नहीं आते, जवान बेटियों और बहुओं के लिए भी आते हैं। वे उनकी काम-क्षुधा का सबसे बड़ा आहार हैं। बूढ़ें संपाती की तरह होरी उन्हें बचाने में असमर्थ है।

मातादीन समझाते हैं: लड़कियों को कुछ दिन के लिए शहर में गोबर के पास छोड़ आओ। शादी तय हो जाए, तब बुला लेना।

बड़ी-बड़ी तरक्कियाँ हुई हैं। पक्के मकान, बिजली, सड़के, स्कूल..पर होरी, उसके जैसे लाखों खेतिहर मजदूर और करोड़ों आदिवासी- इन सबके लिए 1984 आज भी जार्ज आर्वेल का दु:स्वप्न जैसा ही है। आजादी के बाद के आर्थिक उभार और राजनीति का फायदा बहुतों को मिला होगा, पर होरी जैसे खेतिहर मजदूर के लिए न कोई मिनिमम वेजेज़ ऐक्ट लागू होनेवाला है, न वर्कमेंस कंपेसेशन ऐक्ट। न बीमारी में उसकी व्यथा सुननेवाला कोई डाक्टर है न तमंचे की चोट से बचानेवाला कोई थानेदार। उसके बारे में सत्तापतियों की सिर्फ तीन चिंताएँ हैं: उसे बच्चा पैदा करने से कैसे रोका जाए भूदान में मिले एक बीघा ऊसर के लिए उसको ज्यादा-से-ज्यादा विकास-ऋण कैसे पकड़ा दिया जाए और भले ही डकैतों की गोली लगने पर उसे थाने पर रपट लिखाने के लिए चौदह किलोमीटर चलना पड़े, उसका वोट लेने के लिए पोलिंग स्टेशन उसके दरवाजे पर कैसे खड़ा कर दिया जाए। आतंक, असुरक्षा, कर्ज और दरिद्रता से जूझते हुए होरी को अब राहत के नाम पर महुए का अवैध ठर्रा-भर बचा है, जो जार्ज आर्वेल के 1984 में विस्टन स्मिथ को भी विक्टरी जिन के नाम से मिला था, और मिला है पंडित मातादीन के घर का टी.वी. सेट, जो विंस्टन स्मिथ के खुद अपने घर में लगा था। ऐल्डोस हक्सले ने शायद इसी की कल्पना करके आर्वेल को अपने एक पत्र में लिखा था:

‘‘अगली पीढ़ी आते-आते, मुझे लगता है, दुनिया के शासकगण यह जान जाएँगे कि लोगों पर शासन करने के लिए उनमें बालबुद्धि और मृदुता का उद्दीपन क्लबों और जेलों से ज्यादा कारगर साबित हो सकता है और ठोकर और कोड़े मारकर लोगों को काबू में लाने के बजाय प्रेमपूर्वक उनको अपनी दास-भावना में आसक्त बनाकर शक्ति की प्रबल आकांक्षा को मजे से संतुष्ट किया जा सकता है।’’

प्रोलफीड में सबकुछ गलत नहीं है। बेशक, फिल्म एक्टर, संगीतकार, प्रबंध-विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, अंतरिक्षयात्री, उद्योगपति, दार्शनिक, न्यायविद् हमारी जिंदगी को समृद्धतर बनाने में लगे हैं, पर होरी की बदकिस्मती कहिए, उस जिंदगी पर हुकूमत छुरेबाजों, दलालों, सूदखोरों बौद्धिक नपुंसकों, डकैतों, संवेदनहीन हाकिमों और राजनीतिक मौकापरस्तों की है।

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